स्त्री के भीतर एक ऐसा कमरा भी होता है, जहाँ कोई कभी नहीं पहुँचता
स्त्री के भीतर एक ऐसा कमरा भी होता है, जहाँ कोई कभी नहीं पहुँचता
लोग अक्सर स्त्रियों के बारे में बहुत कुछ जानते हैं।
उन्हें पता होता है कि वह किस समय उठती है, क्या बनाना पसंद करती है, किस रंग के कपड़े पहनती है, किस रिश्ते को कितना महत्व देती है। लोग उसके स्वभाव के बारे में भी राय बना लेते हैं वह शांत है, संवेदनशील है, समझदार है, ज़िद्दी है, त्यागी है।
लेकिन इन सबके पीछे एक ऐसा हिस्सा भी होता है जिसके बारे में अक्सर कोई नहीं जानता।
वह हिस्सा जहाँ स्त्री स्वयं से बात करती है।
जहाँ वह माँ नहीं होती, पत्नी नहीं होती, बेटी नहीं होती, बहन नहीं होती। वहाँ उसका कोई सामाजिक परिचय नहीं होता। वहाँ वह केवल एक मन होती है धड़कता हुआ, महसूस करता हुआ, प्रश्नों से भरा हुआ एक मन।
और अजीब बात यह है कि जीवन के सबसे लंबे रिश्ते निभाने वाले लोग भी कभी-कभी उस कमरे तक नहीं पहुँच पाते।
क्योंकि अधिकांश लोग स्त्री के जीवन को देखते हैं, उसके भीतर के जीवन को नहीं।
एक छोटी बच्ची जब बड़ी हो रही होती है, तब उसके भीतर संसार को लेकर हजारों जिज्ञासाएँ जन्म लेती हैं।
वह पेड़ों को देखकर सोचती है कि क्या वे भी थकते होंगे।
वह आसमान को देखकर सोचती है कि बादल कहाँ सोते होंगे।
वह आईने में खुद को देखकर मुस्कुराती है और बिना किसी कारण खुद को अच्छा मान लेती है।
उस समय उसे अपने अस्तित्व के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।
लेकिन धीरे-धीरे उसे दुनिया समझाई जाने लगती है।
उसे बताया जाता है कि अच्छा व्यवहार क्या है।
फिर बताया जाता है कि अच्छी लड़की कैसी होती है।
फिर बताया जाता है कि अच्छी स्त्री कैसी होती है।
और इसी समझाने की प्रक्रिया में कहीं यह बताना छूट जाता है कि वह स्वयं कैसी होना चाहती है।
यहीं से उसके भीतर एक बहुत सूक्ष्म दूरी पैदा होती है...
उसके वास्तविक स्वरूप और उसके निभाए जा रहे स्वरूप के बीच।
शायद यही कारण है कि बहुत-सी स्त्रियाँ दिनभर लोगों के बीच रहने के बाद भी कभी-कभी अजीब-सी थकान महसूस करती हैं।
यह काम की थकान नहीं होती।
यह शरीर की थकान भी नहीं होती।
यह लगातार स्वयं को व्यवस्थित रखते रहने की थकान होती है।
हर बात को सोचकर बोलना।
हर प्रतिक्रिया को नियंत्रित करना।
हर रिश्ते में संतुलन बनाए रखना।
हर टूटन को भीतर ही भीतर संभाल लेना।
यह सब धीरे-धीरे मन की ऊर्जा खा जाता है।
और फिर एक दिन वह बिना किसी विशेष कारण के चुप हो जाती है।
लोग पूछते हैं
"क्या हुआ?"
वह कहती है
"कुछ नहीं।"
और सचमुच कई बार उसे स्वयं भी नहीं पता होता कि क्या हुआ है।
क्योंकि जो थकान वर्षों में जमा हुई हो, उसका कारण किसी एक घटना में नहीं मिलता।
स्त्री के मन की एक और बात है जिसके बारे में कम लिखा गया है।
वह यह कि बहुत-सी स्त्रियाँ अपने जीवन में प्रेम से अधिक स्थान खोजती हैं।
स्थान जहाँ उन्हें किसी को प्रभावित न करना पड़े।
जहाँ उन्हें समझदार सिद्ध न करना पड़े।
जहाँ उन्हें हर समय उपलब्ध न रहना पड़े।
जहाँ उनसे कुछ अपेक्षित न हो।
जहाँ वे थोड़ी देर के लिए बस अस्तित्व में रह सकें।
कई बार उन्हें किसी व्यक्ति की नहीं, ऐसे ही किसी स्थान की कमी महसूस होती है।
एक मानसिक जगह।
एक भावनात्मक आश्रय।
एक ऐसा कोना जहाँ वे कुछ देर के लिए अपने कंधों से दुनिया उतार सकें।
बहुत-सी स्त्रियों के भीतर अधूरी इच्छाएँ नहीं, अधूरी पहचानें रहती हैं।
यह बात अलग है।
इच्छा पूरी हो जाए तो कहानी समाप्त हो जाती है।
लेकिन पहचान अधूरी रह जाए तो वह जीवनभर साथ चलती है।
किसी स्त्री ने शायद चित्र बनाना चाहा था।
किसी ने संगीत सीखना चाहा था।
किसी ने यात्रा करना चाहा था।
लेकिन समय के साथ वे इच्छाएँ भी बदल जाती हैं।
फिर बात चित्रकला या संगीत की नहीं रहती।
फिर भीतर एक प्रश्न बचता है
"यदि जीवन दूसरे रास्ते पर गया होता, तो मैं कौन होती?"
यह प्रश्न किसी उपलब्धि के बारे में नहीं होता।
यह स्वयं को जानने की जिज्ञासा होती है।
और यह जिज्ञासा कई बार बुढ़ापे तक जीवित रहती है।
एक और बात है।
लोग अक्सर सोचते हैं कि स्त्रियाँ बहुत रोती हैं।
लेकिन मुझे लगता है कि स्त्रियाँ जितना रोती हैं, उससे कहीं अधिक रोकती हैं।
वे शब्द रोकती हैं।
आँसू रोकती हैं।
नाराज़गी रोकती हैं।
निराशा रोकती हैं।
और कभी-कभी अपनी इच्छाएँ भी रोकती हैं।
क्योंकि उन्हें बचपन से यह सिखाया जाता है कि संबंधों को बचाए रखना महत्वपूर्ण है।
लेकिन उन्हें यह कम सिखाया जाता है कि स्वयं को बचाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
शायद इसी कारण कुछ स्त्रियाँ उम्र बढ़ने के साथ अलग दिखाई देने लगती हैं।
वे अचानक बदलती नहीं हैं।
वे धीरे-धीरे अपने भीतर लौट रही होती हैं।
वे पहली बार बिना अपराधबोध के "नहीं" कहती हैं।
वे पहली बार अपने लिए समय निकालती हैं।
वे पहली बार अपने मन की बात को महत्व देती हैं।
और जो लोग उन्हें वर्षों से जानते हैं, वे हैरान हो जाते हैं।
उन्हें लगता है कि यह एक नया व्यक्तित्व है।
जबकि सच यह है कि यह वही पुराना व्यक्तित्व है जो दशकों से प्रतीक्षा कर रहा था।
शायद स्त्री के भीतर की बच्ची कभी मरती नहीं।
वह केवल इंतज़ार करती है।
इंतज़ार इस बात का नहीं कि कोई उसे बचाएगा।
बल्कि इस बात का कि कभी ऐसा समय आएगा जब उसे लगातार किसी और के लिए नहीं जीना पड़ेगा।
जब वह फिर से किसी शाम खिड़की के पास बैठकर बिना वजह आसमान देख सकेगी।
जब उसे किसी काम के बीच अचानक याद आएगा कि उसे बारिश की खुशबू अब भी अच्छी लगती है।
जब वह आईने में खुद को देखकर केवल यह नहीं सोचेगी कि वह कैसी दिख रही है, बल्कि यह भी महसूस करेगी कि वह अब भी वही है वह लड़की, जो कभी दुनिया को आश्चर्य से देखती थी।
और शायद मनुष्य के भीतर बची हुई सबसे सुंदर चीज़ यही है ....
कि चाहे जीवन कितनी भी परतें चढ़ा दे, भीतर कहीं एक हिस्सा ऐसा रहता है जो अब भी स्वतंत्र होना चाहता है, अब भी प्रेम करना चाहता है, अब भी हँसना चाहता है, और अब भी चाहता है कि कोई उसे उसकी भूमिकाओं से अलग पहचान ले।
स्त्री के भीतर वह हिस्सा अक्सर एक बच्ची के रूप में जीवित रहता है।
शांत।
अदृश्य।
लेकिन पूरी तरह जीवित।
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