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रात अपने अंतिम पहर में थी।

रात अपने अंतिम पहर में थी।

चाँद की उजली साँसें
खिड़की से उतरकर
तुम्हारी देह पर
दूधिया नदी-सी बह रही थीं।

संसार सो चुका था,
पर हमारी धड़कनों में
एक अनकहा उत्सव
धीरे-धीरे जाग रहा था।

मेरी उँगलियाँ
आकर तुम्हारी कमर पर ठहर गईं—

वहाँ एक करधनी थी...

सोने की नहीं,
मानो चाँदनी ने
अपनी सबसे पतली किरणों को
गूँथकर
तुम्हारी कटि पर बाँध दिया हो।

उसकी छोटी-छोटी कड़ियाँ
ऐसी चमकती थीं
जैसे गंडक की धारा में
पूर्णिमा की रात
तारे उतर आए हों।

मैंने उसे छुआ—

इतना धीरे
कि स्पर्श भी
तुमसे अनुमति माँगता हुआ लगे।

तुम्हारी पलकों ने
आँखों पर सांझ रख ली,
और होंठों पर
एक मौन मुस्कान खिली—
जैसे किसी कली को
भोर का पहला रहस्य मिल गया हो।

मैंने पहली कड़ी खोली।

फिर दूसरी...

फिर तीसरी...

हर खुलती कड़ी
ऐसी ध्वनि करती थी
मानो किसी प्राचीन मंदिर में
धीरे से एक घंटी बज उठी हो,
और उसका कंपन
सीधे हृदय तक उतर गया हो।

करधनी खुलती गई...

और उसके साथ
तुम्हारी साँसें भी
धीरे-धीरे
बंधनों से मुक्त होने लगीं।

ऐसा लगा
मानो बरसों से बाँधा गया
कोई झरना
पहली बार
अपने ही संगीत में बह निकला हो।

तुम्हारी कमर
अब किसी अलंकार की नहीं,
स्वयं प्रकृति की कविता लग रही थी—

जैसे नदी ने
अपने किनारों से कहा हो,

"अब मुझे बहने दो..."

मैंने करधनी को
अपनी हथेलियों में समेट लिया।

उसमें अब भी
तुम्हारी त्वचा की ऊष्मा थी,
तुम्हारी सुगंध थी,
और वह अनकही स्वीकृति थी
जो प्रेम में
शब्दों से नहीं,
विश्वास से जन्म लेती है।

मैंने तुम्हारी ओर देखा।

तुमने कुछ नहीं कहा।

पर तुम्हारी झुकी हुई पलकों ने
मुझसे अधिक बोल दिया।

उस क्षण
मुझे लगा—

मैं कोई आभूषण नहीं खोल रहा,

मैं उस चाँदनी का बंधन खोल रहा हूँ
जो सदियों से
एक नदी के जल पर
सिमटकर बैठी थी।

अब वह चाँदनी
पूरे प्रवाह में फैलना चाहती थी।

मैंने आँखें बंद कर लीं।

क्योंकि कुछ सौंदर्य
देखने के लिए नहीं,
महसूस करने के लिए जन्म लेते हैं।

करधनी का खुलना
उस रात
केवल एक अलंकार का उतरना नहीं था—

वह दो आत्माओं के बीच
विश्वास का अंतिम द्वार खुलना था।

जहाँ न कोई उतावलापन था,
न कोई आग्रह।

केवल प्रेम...

जो उँगलियों की धीमी थरथराहट में,
साँसों की मिली हुई लय में,
और चाँदनी से धुली उस कटि की
निर्वाक गरिमा में

अपना सबसे मादक,
सबसे पवित्र,
सबसे सुंदर रूप
धारण कर चुका था।

और मैं—

उस खुले हुए क्षण के सामने
वैसे ही नत खड़ा रहा,

जैसे कोई साधक
पहली बार
मंदिर का गर्भगृह खुलते देखे,

जहाँ स्पर्श भी
प्रार्थना बन जाता है,
और प्रेम...

अपनी सबसे गहरी
मौन भाषा में
धड़कने लगता है।

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