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कामसूत्र के अनुसार कामध्वनियों के प्रकार

अक्सर हम मानते हैं कि काम-क्रीड़ा केवल…
दो शरीरों के स्पर्श और दृष्टि का खेल है, 
लेकिन हमारे प्राचीन ऋषियों ने सदियों पहले…
यह समझ लिया था कि रति का असली आनंद 
श्रवण यानी सुनने में भी छिपा है। 

जब दो प्रेमी एकांत में एक-दूसरे में खोते हैं, 
तो वहां सन्नाटा नहीं, बल्कि एक मधुर संगीत गूंजना चाहिए। 
कामसूत्र के अनुसार, रति-क्रीड़ा में मुख से निकलने वाली स्वाभाविक ध्वनियां चाहे वह दबी हुई आहें हों, 
तीखी सिसकियाँ हों, या बेकाबू होकर निकलती आवाज़ें 
केवल शोर नहीं, बल्कि कामाग्नि को धधकाने वाला ईंधन हैं। 
मौन जहाँ शांति देता है, 
वहीं बेडरूम में आवाज़ जीवन और ऊर्जा का संचार करती है।
कामसूत्र के रचयिता महर्षि वात्स्यायन ने रति क्रीड़ा को 
केवल एक शारीरिक मिलन नहीं, 
बल्कि एक कलात्मक अभिव्यक्ति माना है। 
इस कला में स्पर्श और दृष्टि के साथ-साथ श्रवण का भी 
गहरा महत्व है। जब दो प्रेमी मिलन की चरम अवस्था की 
ओर बढ़ते हैं, 
तो भाषा पीछे छूट जाती है और केवल ध्वनि ही संवाद का माध्यम रह जाती है। 
कामसूत्र में इन स्वाभाविक ध्वनियों को सीत्कार और विरुत कहा गया है। 
यह वह संगीत है जो दो आत्माओं के मिलन से उत्पन्न होता है।
कामसूत्र के अनुसार कामध्वनियों के प्रकार;
 वर्ण मूलक ध्वनियां 
वात्स्यायन ने सबसे पहले उन ध्वनियों का उल्लेख किया है 
जो अक्षरों या वर्णों पर आधारित होती हैं। 
जब रति का आरंभ होता है या मध्य अवस्था होती है, 
तब ये ध्वनियां निकलती हैं:-

१) हिंकार
यह एक गंभीर और गहरी ध्वनि है, 
जैसे गले के भीतर से हूँ... हूँ... की गूंज। 
यह अक्सर तब निकलती है जब स्पर्श सुखद हो।
लेकिन बहुत तीव्र न हो। 
यह एक तरह की सहमति है।

२) स्तनित
जैसे बादलों की गड़गड़ाहट होती है, 
वैसे ही काम के वेग के बढ़ने पर हिंकार का स्वर भी 
भारी और तेज़ हो जाता है। 
इसे स्तनित कहा गया है। 
यह साथी को संकेत देता है कि उत्तेजना बढ़ रही है।

३) कूजित
यह कबूतर के गुटरगूँ करने जैसी मधुर, 
लयबद्ध और लगातार निकलने वाली आवाज़ है। 
यह तब होती है जब साथी अत्यधिक प्रेम, 
कोमलता और सुख का अनुभव कर रहा हो।

४) रुदित
इसे रोने जैसी ध्वनि कहा गया है। 
लेकिन यह दुख के आंसू नहीं, बल्कि आनंदाश्रु हैं। 
जब सुख की सीमा पार हो जाती है और गला भर आता है, 
तब निकलने वाली यह आवाज़ परमानंद की निशानी है।
 वायु मूलक ध्वनियां
जब रति क्रीड़ा में दंत-क्षत या नख-क्षत का प्रयोग होता है, 
तब दर्द और सुख के मिश्रित भावों को व्यक्त करने के 
लिए विशेष ध्वनियां निकलती हैं। 
इन्हें वायु के प्रवाह के आधार पर बांटा गया है;

१) सीत्कार
जब साथी को हल्का दर्द और तीव्र सुख एक साथ 
महसूस होता है, 
तो वह दातों को भींचकर हवा को अंदर की ओर खींचता है।
 इससे सी-सी की आवाज़ आती है। 
यह ध्वनि बताती है कि स्पर्श बहुत गहरा और असरदार है।

२) फूत्कृत
यह सीत्कार का विपरीत है। 
जब उत्तेजना इतनी अधिक हो जाए 
कि उसे अंदर रोकना मुश्किल हो, 
तो होठों को गोल करके हवा को बाहर की ओर 
जोर से छोड़ा जाता है, 
जिससे फू-फू की आवाज़ आती है। 
यह एक तरह से शरीर की गर्मी और तनाव को बाहर 
निकालने की प्रक्रिया है।
 प्रकृति का अनुकरण
कामसूत्र का सबसे सुंदर पहलू यह है।
कि यह मनुष्य को प्रकृति से अलग नहीं मानता। 
वात्स्यायन लिखते हैं कि रति के चरम क्षणों में 
प्रेमी-प्रेमिका सुध-बुध खो बैठते हैं।
और उनकी आवाज़ें पक्षियों की तरह हो जाती हैं। 
इसे विरुत कहा गया है।

१) पारावत
कबूतर की तरह कोमल और लगातार गुटरगूँ करना, 
जो रति की निरंतरता और लय को दर्शाता है।
२) कोकिल
कोयल की तरह मीठी और तीखी कूक, 
जो अचानक उठी उत्तेजना की लहर को व्यक्त करती है।
३) भ्रमर
भौंरे की तरह गुंजन करना। 
यह ध्वनि तब निकलती है 
जब साथी आंखें बंद करके एक गहरे आनंद की 
अवस्था में होता है।
४) हंस
हंस की तरह गंभीर और मादक ध्वनि, 
जो रति की समाप्ति और संतुष्टि की ओर इशारा करती है।
कामसूत्र यह स्पष्ट करता है।
कि ये सभी ध्वनियां भाव-विह्वल अवस्था में अपने 
आप निकलनी चाहिए। 
यदि ये बनावटी हैं, 
तो इनका कोई प्रभाव नहीं होता। 
रति रहस्य के अनुसार, 
ये आवाज़ें पुरुष साथी की शक्ति और उत्साह को 
बढ़ाने के लिए मंत्र का काम करती हैं। 
यह शर्म का नहीं, बल्कि मुक्ति का विषय है। 
जब आप अपनी आवाज़ को स्वतंत्र छोड़ देते हैं, 
तो आप न केवल अपने आनंद को स्वीकार करते हैं, 
बल्कि अपने साथी को भी यह विश्वास दिलाते हैं।
कि उनका प्रयास सफल है।
आधुनिक मनोविज्ञान भी कामसूत्र की इस बात का 
समर्थन करता है कि; साथी की उत्तेजक आवाज़ें

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