पत्नी को प्रेमिका बनने का अवसर ही कब मिला
पत्नी को प्रेमिका बनने का अवसर ही कब मिला?
विवाह के बाद पुरुष के जीवन में बहुत कुछ बदलता है ज़िम्मेदारियाँ बढ़ती हैं, खर्चे बढ़ते हैं, समय की कमी होने लगती है। लेकिन इन्हीं परिवर्तनों के बीच एक और बदलाव चुपचाप जन्म लेता है, जिसका हिसाब किसी डायरी में दर्ज नहीं होता। वह है प्रेम के व्यवहार का बदल जाना।
जिस स्त्री की एक मुस्कान कभी दिनभर का इंतज़ार बन जाती थी, वही स्त्री विवाह के कुछ वर्षों बाद घर की व्यवस्था का हिस्सा समझ ली जाती है। उसका होना इतना स्वाभाविक मान लिया जाता है कि उसके होने पर ध्यान ही नहीं जाता। जैसे घर की दीवारें दिखाई नहीं देतीं, पर उनके बिना घर खड़ा भी नहीं रह सकता।
प्रेमिका से मिलने के लिए आदमी समय नहीं निकालता, समय बना लेता है। रास्ते लंबे हों, जेब खाली हो, मौसम ख़राब हो कोई बहाना उसके उत्साह को रोक नहीं पाता। लेकिन वही आदमी, जब पति बनता है, तो पत्नी के साथ आधा घंटा बैठने के लिए भी कारण ढूँढ़ने लगता है। यह परिवर्तन अचानक नहीं आता; यह रोज़मर्रा की छोटी-छोटी उपेक्षाओं से जन्म लेता है।
पत्नी की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं कि वह खाना अच्छा बनाती है या घर सँभालती है। उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह धीरे-धीरे अपने जीवन को परिवार की ज़रूरतों में इस तरह मिला देती है कि उसका अलग अस्तित्व दिखाई देना कम हो जाता है। वह अपने हिस्से की नींद छोड़ देती है, अपनी इच्छाएँ टाल देती है, अपने शौक़ बाद के लिए रख देती है, और यह सब अक्सर बिना किसी घोषणा के करती है।
घर के लोगों को गर्म रोटी मिले, बच्चों की पढ़ाई ठीक चले, बुज़ुर्गों की दवा समय पर पहुँचे, पति बिना चिंता के काम कर सके इन सबके बीच उसका अपना नाम कहीं पीछे छूट जाता है। यह त्याग किसी मंच पर सम्मान नहीं पाता, लेकिन इसी पर एक परिवार की नींव टिकी होती है।
विडंबना यह है कि जो प्रेम पहले शब्दों में व्यक्त होता था, वही विवाह के बाद मानो अनुमान पर छोड़ दिया जाता है। पति सोचता है "उसे पता ही है कि मैं उससे प्रेम करता हूँ।" पत्नी भी कुछ नहीं कहती, क्योंकि उसे शिकायत से अधिक साथ चाहिए। मगर प्रेम, यदि समय-समय पर व्यक्त न किया जाए, तो वह मन में होते हुए भी दूसरे तक पूरी तरह पहुँच नहीं पाता।
स्त्रियाँ हमेशा बड़े उपहारों की प्रतीक्षा नहीं करतीं। कई बार उन्हें केवल इतना चाहिए होता है कि कोई बिना जल्दी में हुए उनकी पूरी बात सुन ले। कोई यह पूछ ले कि दिन कैसा रहा। कोई यह महसूस कर ले कि चेहरे की मुस्कान आज थोड़ी कम क्यों है।
कितनी अजीब बात है जिस स्त्री के साथ एक ही छत के नीचे वर्षों बिताए जाते हैं, उसी से सबसे कम बातें होने लगती हैं। बाहर के लोगों के लिए हमारे पास धैर्य होता है, विनम्रता होती है, मुस्कान होती है; लेकिन घर लौटते-लौटते हम अपना सबसे थका हुआ, सबसे चिड़चिड़ा रूप उसी व्यक्ति को दे देते हैं, जिसने हमारा सबसे अधिक साथ निभाया है।
रिश्ते बड़े कारणों से कम, छोटे व्यवहारों से अधिक बनते और बिगड़ते हैं। दरवाज़ा खोलते समय एक मुस्कान, बिना कहे पानी का गिलास देना, थकान देखकर चुपचाप पास बैठ जाना, बिना किसी अवसर के एक फूल ले आना, या बस इतना कहना "आज तुम बहुत थक गई होगी..." ये बातें छोटी अवश्य हैं, पर इन्हीं में वैवाहिक जीवन की सबसे बड़ी ऊष्मा छिपी रहती है।
एक दिन बच्चे अपने जीवन में व्यस्त हो जाएँगे। कामकाज भी एक समय के बाद पीछे छूट जाएगा। तब यदि कोई आपके साथ बैठकर पुरानी बातें याद करेगा, आपकी दवाइयों का समय देखेगा, आपकी चुप्पियों का अर्थ समझेगा, तो वह वही स्त्री होगी जिसे आपने कभी अपनी पत्नी कहा था।
इसलिए विवाह को केवल निभाइए मत, उसे हर दिन थोड़ा-थोड़ा जीइए। जिस स्त्री ने आपके नाम के साथ अपना पूरा जीवन जोड़ दिया, उसे यह एहसास भी मिलना चाहिए कि उसके जीवन का निर्णय सही था।
क्योंकि प्रेम का सबसे सुंदर रूप वह नहीं, जो पहली मुलाक़ात में दिखाई देता है।
प्रेम का सबसे सुंदर रूप वह है, जो बीस वर्ष बाद भी एक-दूसरे के लिए चाय का कप बनाते समय मुस्कुरा सके।
और शायद यही वह क्षण होता है, जब पत्नी फिर से प्रेमिका बन जाती है फ़र्क सिर्फ़ इतना होता है कि इस बार प्रेम में आकर्षण से अधिक अपनापन, और शब्दों से अधिक विश्वास शामिल होता है।
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