मस्त_रहने_का_समय
यह जीवन एक चक्र है जो आरंभ हुआ है तो पूरा भी होगा। बचपन के बाद किशोरावस्था, युवावस्था के पश्चात प्रौढ़ावस्था और उसके बाद वृद्धावस्था- ये वर्तुल है जो सबको देखना है। यह उम्र हमारी कड़ी परीक्षा लेता है क्योंकि शरीर कमजोर पड़ रहा है, थकान बढ़ गई है, उदासी घेर रही है। कमाई-धमाई बंद हो चुकी है, शारीरिक कष्ट बढ़ रहे हैं- बीमारी, घुटनों में दर्द, कमर में जकड़न, पेट साफ न होना, नीद न आना, कम दिखना, कम सुनाई पड़ना जैसी अनेक समस्याएँ हैं। इनके साथ-साथ इस उम्र में एक और बड़ी समस्या रहती है कि अपना समय कैसे काटें ? लोगों की नज़रें भी बदली-बदली दिखाई पड़ती है, उपेक्षा होती है, मान-सम्मान कम होता दिखाई पड़ता है।
हमारी कई इच्छाएँ और अभिलाषाएँ अपना पेट भरने की तलाश में अधूरी रह गई थी, उन्हें पूरा करने का यह सबसे माकूल समय है। इस उम्र में अब आप दबावमुक्त हैं, स्वतंत्र हैं, आपके पास समय ही समय है, अपने मन की अधूरी आस पूरी कर डालिए। संगीत सीखना चाहते थे या गाना, फोटोग्राफी करना चाहते थे या पेंटिंग, कविता लिखना चाहते थे या लेख, बागवानी करना चाहते थे या खेती, व्यापार करना चाहते थे या नौकरी, तीर्थ करना चाहते थे या विश्व भ्रमण, परिवार की देखरेख करना चाहते थे या जनसेवा > अपने मन का कर डालिए, अच्छा मौका है। यह अवसर अधिक दिन के लिए नहीं मिला है क्योंकि आपके पास समय कम है।
जैसे-जैसे आप की उम्र बढ़ेगी, आपकी उम्मीदें भी बढ़ेंगी, यही आपको दुख पहुंचाएंगी। अब खुद से और दूसरों से भी उम्मीदें करना बंद करिए। इस उम्र में आपको कोई पहचान ले, जो जितना कर दे, उतना बहुत है। सारा संसारिक व्यवहार उपयोगिता पर आधारित है, यदि आपकी उपयोगिता समाप्त हो गई है तो चुप बैठिए या जैसा संभव हो, खुद को उपयोगी बनाइए। घर के कई काम अभी भी आप अपने हाथ में ले सकते हैं, ले लीजिए। आपके आसपास अब आपको खुशियाँ खोजनी होंगी, खोजिए, आनन्द सब तरफ बिखरा हुआ है, अपना नज़रिया बदलिए, बहुत कुछ नया दिखाई पड़ेगा। टीका-टिप्पणी करने का सोच और बोल आपके लिए अब घातक है, इस आदत को तुरंत 'फुल स्टाप' कर दें अन्यथा आपका शेष जीवन जीना दूभर हो जाएगा, अब आपका रुतबा नहीं चलने वाला !
जैसा बचपन था, जवानी थी, वैसा ही यह बुढ़ापा है- जीवन का सर्वाधिक महत्व वाला हिस्सा। इसे तटस्थ होकर देखिए कि यह कैसा गुजर रहा है ! असुविधा और तकलीफ़ों पर नज़र गड़ाए रखेंगे तो वे आपके दिमाग पर हावी रहेंगे, आपका चैन छीन लेंगे। 'जो हो रहा है,वह सही है' - की सोच बनाइए, तब ही आपका मन शांत रहेगा वरन नए जमाने का व्यवहार, बातचीत, आदतें और वेषभूषा- आपको ये सब तकलीफ देने वाले हैं। नया ज़माना अपने ढंग से चलेगा, आपके कहने से नहीं। उन्हें अपना काम करने दें, आप अपना काम करें।
आपके पास सबसे प्रबल विकल्प है- आपका दीर्घ अनुभव. इस अनुभव का उपयोग खोजें. अब आप युवा नहीं हैं, इसे समझते हुए अपनी क्षमता और योग्यता का आकलन करके उसके अनुरूप काम खोजिए. आप नई पीढ़ी को बहुत कुछ सिखा सकते हैं, उन्हें बहुत कुछ देकर जा सकते हैं. बच्चों को पढ़ा सकते हैं, उनके साथ खेल सकते हैं, खेल सिखा सकते हैं. गरीब और बेसहारा लोगों के लिए सहारा बन सकते हैं लेकिन उन्हें मछली खिलाकर पुण्य न कमाएं बल्कि मछली पकड़ना सिखाएं.
स्वयं स्वस्थ रहें और दूसरों को स्वस्थ रहने के उपाय सिखाएं, व्यायाम और योग से जोड़ें, उन्हें खानपान की अच्छी आदतों से जोड़ें. मोहल्ले के बच्चों और युवाओं से दोस्ती बनाएं और निभाएं, यह बहुत रोचक काम है. ‘लायब्रेरी’ से जुड़ें और विविध विषयों पर नई जानकारियां लें और उन्हें युवाओं में वितरित करें. इस बात का सदैव ध्यान रखें कि आपके पास समय ही समय है लेकिन शेष लोगों के पास नहीं है इसलिए उनके समय के महत्व को समझते हुए उन पर बोझ न बनें अन्यथा लोग आपसे बिदकने लग जाएंगे और आपको देखते ही मन-ही मन में कहेंगे- ‘बुढ़ऊ आ गया दिमाग चाटने !
घर के काम सम्भालना आरम्भ करें. सुबह जागने के बाद बिस्तर, चादर, रजाई-कम्बल और मच्छरदानी अपने हाथों से समेटें, अपने हाथ से सुबह की चाय सबके लिए बनाएं, ड्राइंगरूम को व्यवस्थित कर दें लेकिन शान्तिपूर्वक ताकि किसी को ‘डिस्टर्वेंस’ न हो. सुबह सैर के लिए निकल सकते हैं, किसी सार्वजनिक स्थान में जाएं और नए लोगों से पहल करके मित्रता स्थापित करें. व्यायाम करें, चर्चा में भाग लें और प्रकृति की खूबसूरती को निहारें. दोनों हाथों को आकाश की ओर उठाकर खुद में उसकी विशालता को समेटने का प्रयास करें और दृश्यमान देवता सूर्य को प्रणाम करें.
अपने काम खुद करने का प्रयास करें. किसी पर बोझ न बनें बल्कि सहायक बनने का उपक्रम करें. याद रखिए, आपका शरीर तनिक वृद्ध हो चला है, मन अभी युवा है- उसकी ताज़गी बनाए रखें लेकिन सतर्कता के साथ ! हर समय मुस्कुराने की आदत बना लें तो आप भी खुश और दूसरे भी.
अंत में, मृत्यु के स्वागत के लिए हर समय तैयार रहें. आप अपनी पारी खेल चुके, अब नए लोगों को मौका देना है. मृत्यु का आगमन एक सुखद अंत है- इस कष्टप्रद शरीर का. शरीर से मुक्त होना अपने जन्म से मुक्त होना है, वर्तुल तो पूरा होगा, होने दीजिए. जो आप कर सके, वह आपने कर लिया अब मुक्ति के आगमन के उत्सव को मनाने की तैयारी में भिड़ जाएँ.
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